आज मैं बहुत खुश हूँ। बड़े भैया कल शहर से आए और सुबह उठते ही मुझे बुलाकर कहा...मोहन..आज हम पटाखे लेने चलेंगें...जल्दी से तैयार हो जाओ और रवि को भी तैयार कर लो... दस बजे हम निकल पड़ेंगे।
रवि बड़े भइया का आठ साल का इकलौता बेटा है जो कि हमारे साथ ही रहता है और मुझसे तीन साल छोटा है। भइया और भाभी दोनों शहर में नौकरी करते हैं। भाभी ने रवि के छः महीने का होते ही दुबारा नौकरी ज्वाइन कर ली थी। कहते हैं शहर में अगर मियां-बीवी दोनों काम ना करे तो गुजारा नहीं होता। माँ एक बार भैया के पास रहने गई और जब देखा कि भाभी की नौकरी की वजह से रवि की देखभाल सही ढंग से नही हो पा रही तो उसे यहाँ ले आई। तब से रवि यहीं है और बड़े होने पर उसका यहीं स्कूल में दाखिला भी करवा दिया गया। रवि के आने से मुझे खेलने को एक साथी मिल गया। हमलोग साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और सोते थे। भैया-भाभी छुट्टियों में हमारे पास आ जाते थे, तब तो और भी मज़ा आता था। हालाँकि दिवाली पर बड़े भैया काफी सालों बाद ही आए हैं ।
रवि बड़े भइया का आठ साल का इकलौता बेटा है जो कि हमारे साथ ही रहता है और मुझसे तीन साल छोटा है। भइया और भाभी दोनों शहर में नौकरी करते हैं। भाभी ने रवि के छः महीने का होते ही दुबारा नौकरी ज्वाइन कर ली थी। कहते हैं शहर में अगर मियां-बीवी दोनों काम ना करे तो गुजारा नहीं होता। माँ एक बार भैया के पास रहने गई और जब देखा कि भाभी की नौकरी की वजह से रवि की देखभाल सही ढंग से नही हो पा रही तो उसे यहाँ ले आई। तब से रवि यहीं है और बड़े होने पर उसका यहीं स्कूल में दाखिला भी करवा दिया गया। रवि के आने से मुझे खेलने को एक साथी मिल गया। हमलोग साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और सोते थे। भैया-भाभी छुट्टियों में हमारे पास आ जाते थे, तब तो और भी मज़ा आता था। हालाँकि दिवाली पर बड़े भैया काफी सालों बाद ही आए हैं ।
इस दिवाली पर बड़े भैया को प्रमोशन मिला है, घर में सभी बड़े खुश हैं। और मेरा मन तो बल्लियों ऊछल रहा है, क्योकि इस बार बड़े भैया पटाखे दिलवाने ले जा रहे हैं। बल्लू भैया, जो कि बाबूजी की दुकान सम्हालता है, हमें पटाखों के लिए बड़ा तरसाता है। बाबूजी से तो कभी पैसे मांगने की हिम्मत ही नहीं होती। माँ भी काफी मिन्नतें करने के बाद जितने पैसे देती थी, उससे एक दो-पैकेट ही आते थे और वह भी छोटे वाले। गली के बच्चे तो दिवाली के पन्द्रह दिन पहले से ही पटाखे बजाना शुरू कर देते हैं। मैं और रवि कभी तो उनके पटाखों के बीच ही कूद-कूद कर खुश होते रहते, या फ़िर उदास होकर दूर खड़े देखते रहते। बल्लू भैया बस दिवाली वाले दिन एक थैला भरकर पटाखे लाता, लेकिन मांगने पर झिड़क देता कि दुकान पर पूजा होने के बाद मिलेंगे। दुकान पर पूजा रात को दस बजे के बाद होती है। हम अपनी नींद भगाने का भरसक प्रयास करते हुए पटाखों के थैले पर नजर गडाये बैठे रहते कि कब पूजा समाप्त हो और कब हम पटाखे चलायें। कई बार तो हम सो ही जाते थे और जो जगे रहते तो भी अकेले-अकेले चलाने में मज़ा नहीं आता, बाक़ी बच्चे तो सो चुके होते थे। शाम होते ही मेरे दोस्त एक दुसरे के साथ होड़ में चलाते थे, उसमे जो मज़ा आता है वो अकेले में कहाँ? एक का बजना बंद तो दुसरे का शुरू। लेकिन जब तक बल्लू भैया हमें देता, तब गली में कुत्ते भौंक रहे होते । लेकिन इस बार बल्लू की कोई फ़िक्र नहीं। अबकी बार हम दिल खोल कर पटाखे लेंगे, चलाएंगे और देखते हैं "मोहन एंड रवि द ग्रेट" के आगे कौन टिकता है।
मैं और रवि तो सुबह आठ बजे से ही तैयार होकर बैठे हैं। बारी-बारी से अन्दर लगी घड़ी को देखकर आते हैं। आज पता नहीं क्यों दस बज ही नहीं रहे हैं। अंततः बड़े भैया, मैं और रवि बाज़ार के लिए रवाना हो गए। बाप रे ! बाज़ार में आज बड़ी भीड़ है और पटाखों की दुकान पर तो पैर रखने की भी जगह नहीं है। बड़े भैया मुझे पूछ-पूछ कर पटाखे ले रहे हैं, रवि तो अभी छोटा है, उसे पटाखों के बारे में ज्यादा पता नहीं है। मैं उचक-उचक कर बताता हूँ... बड़े भैया यह अनार ले लो...वो रॉकेट.... और वो फुलझडी। और एक घंटे बाद दो बड़े-बड़े थैले लेकर हम शान से घर की ओर चल दिए।
रास्ते भर मैं शाम की कल्पना में मगन था। आज हमारे पास इतने सारे पटाखे देख कर तो गली के बच्चों को पसीना आ जाएगा। बड़े दिनों से हमें ललचा-ललचा कर पटाखे चला रहे थे, आज देखते हैं किसमे कितना है दम। कब घर आ गया पता ही नहीं चला। दोंनों थैले लेकर बड़े भैया रिक्शा से उतरे और रवि को उतारा। मैं तो ख़ुद ही कूद कर उतर गया।
मेरे मन में आगे का चित्र घूम रहा था। अब बड़े भैया अन्दर जायेंगे...भाभी पानी लेकर आएगी..भैया एक थैला मुझे देंगे और एक रवि को और कहेंगे....मोहन! रवि के पटाखे भी तुम ही चलवाना...यह तो छोटा है । बड़े भैया अन्दर गए... भाभी पानी लाई..भैया ने दोनों थैले भाभी को दिए और कहा....इन्हे अन्दर रख दो ...और आँख मूँद कर लेट गए। यह क्या....अब तक तो जैसा मैंने सोचा था वैसे ही हुआ...पर ....क्या बड़े भैया भी बल्लू भैया की तरह.......। मेरा गला सुख रहा था....मैंने थूक निगलते हुए दबी जुबान में पूछा ...."बड़े भैया....पटाखे?"... भैया ने चौंक कर आँखे खोली और खंखारते हुए बोले..."अरे हाँ.... मैं तो भूल ही गया था।" उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला...एक पाँच रुपये का नोट निकला और मुझे पकडाते हुए कहा ...."ऐसा करो मोहन...तुम भी अपने लिए पटाखे ले आओ।" गली में बड़ी जोर से धडाम की आवाज हुई....लगता है किसी ने बड़े वाला एटम बम फोड़ा है।
(इस कहानी के पात्र और घटनाए काल्पनिक है, किसी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा घटना के साथ इसका कोईसम्बन्ध नहीं है। किसी के नाम और घटना का मिलना महज संयोग है। )
मैं और रवि तो सुबह आठ बजे से ही तैयार होकर बैठे हैं। बारी-बारी से अन्दर लगी घड़ी को देखकर आते हैं। आज पता नहीं क्यों दस बज ही नहीं रहे हैं। अंततः बड़े भैया, मैं और रवि बाज़ार के लिए रवाना हो गए। बाप रे ! बाज़ार में आज बड़ी भीड़ है और पटाखों की दुकान पर तो पैर रखने की भी जगह नहीं है। बड़े भैया मुझे पूछ-पूछ कर पटाखे ले रहे हैं, रवि तो अभी छोटा है, उसे पटाखों के बारे में ज्यादा पता नहीं है। मैं उचक-उचक कर बताता हूँ... बड़े भैया यह अनार ले लो...वो रॉकेट.... और वो फुलझडी। और एक घंटे बाद दो बड़े-बड़े थैले लेकर हम शान से घर की ओर चल दिए।
रास्ते भर मैं शाम की कल्पना में मगन था। आज हमारे पास इतने सारे पटाखे देख कर तो गली के बच्चों को पसीना आ जाएगा। बड़े दिनों से हमें ललचा-ललचा कर पटाखे चला रहे थे, आज देखते हैं किसमे कितना है दम। कब घर आ गया पता ही नहीं चला। दोंनों थैले लेकर बड़े भैया रिक्शा से उतरे और रवि को उतारा। मैं तो ख़ुद ही कूद कर उतर गया।
मेरे मन में आगे का चित्र घूम रहा था। अब बड़े भैया अन्दर जायेंगे...भाभी पानी लेकर आएगी..भैया एक थैला मुझे देंगे और एक रवि को और कहेंगे....मोहन! रवि के पटाखे भी तुम ही चलवाना...यह तो छोटा है । बड़े भैया अन्दर गए... भाभी पानी लाई..भैया ने दोनों थैले भाभी को दिए और कहा....इन्हे अन्दर रख दो ...और आँख मूँद कर लेट गए। यह क्या....अब तक तो जैसा मैंने सोचा था वैसे ही हुआ...पर ....क्या बड़े भैया भी बल्लू भैया की तरह.......। मेरा गला सुख रहा था....मैंने थूक निगलते हुए दबी जुबान में पूछा ...."बड़े भैया....पटाखे?"... भैया ने चौंक कर आँखे खोली और खंखारते हुए बोले..."अरे हाँ.... मैं तो भूल ही गया था।" उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला...एक पाँच रुपये का नोट निकला और मुझे पकडाते हुए कहा ...."ऐसा करो मोहन...तुम भी अपने लिए पटाखे ले आओ।" गली में बड़ी जोर से धडाम की आवाज हुई....लगता है किसी ने बड़े वाला एटम बम फोड़ा है।
(इस कहानी के पात्र और घटनाए काल्पनिक है, किसी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा घटना के साथ इसका कोईसम्बन्ध नहीं है। किसी के नाम और घटना का मिलना महज संयोग है। )





